Sunday, January 27, 2019

आँधी' चली, पर गुलज़ार से कमलेश्वर का मन टूटाः विवेचना

कमलेश्वर से मेरी पहली मुलाक़ात सन 2001 में हुई थी. वो बीबीसी हिंदी के 'लाइव' कार्यक्रम में भाग लेने बीबीसी के पुराने दफ़्तर 'आइफ़ैक्स' बिल्डिंग में आए हुए थे.

26 जनवरी का दिन था. अचानक बहुत ज़ोर से धरती हिली थी और दफ़्तर के सारे लोग सीढ़ियों से भागते हुए सड़क पर आ गए थे. एक अकेले कमलेश्वर थे जो हाथ में 'डनहिल' की सिगरेट लिए, कश लगाते वहीं 'पैंट्री' में खड़े रह गए थे.

मेरी तरफ़ देख कर बिना किसी घबराहट के बोले थे, 'बैठिए यहाँ कुछ नहीं होगा.'

उनसे दूसरी मुलाक़ात शायद दो साल बाद फिर बीबीसी स्टूडियो में हुई थी और मैंने उनसे पूछा था, 'आप कई शहरों में रहे हैं, मैनपुरी, इलाहाबाद, मुंबई और दिल्ली...इनमें से किस शहर को अपने सबसे नज़दीक पाते हैं?'

कमलेश्वर ने मुस्कराते हुए जवाब दिया था, 'इनमें से कोई ऐसा शहर नहीं हैं, जिसे मैं भूल सकूं. मेरी बहुत ख़ूबसूरत यादें मैनपुरी की है. एक हमारे यहाँ ईशान नदी हुआ करती थी, जिसे लोग 'ईसन' कहते थे. उसके किनारे घूमने जाना, शैतानियाँ करना, जंगलों में चले जाना, वहाँ से बेर तोड़ना, आम तोड़ना, खेतों से सब्ज़ियों की चोरी करना... ये सब चलता था और बहुत आनंद आता था.'

'सबसे बड़ी चीज़ थी कि मैनपुरी में ही मेरा पहला इश्क हुआ था. इश्क के बारे में कुछ मालूम तो था नहीं. कोई अच्छा लगने लगा तो इश्क हो गया. एक बंधी बंधाई रवायत सी थी कि मेरे और उसके बीच में बहुत ही घटिया समाज बीच में आ रहा था. उससे कहने की हिम्मत ही नहीं होती थी. न उसकी हिम्मत होती थी कि भर-आँख मुझे देख ले. ये समझ लीजिए कि करीब ढाई तीन फ़र्लांग से ये इश्क चला करता था.'

'जब उसकी शादी होने लगी तब मामला थोड़ा गंभीर हो गया. उस वक्त महसूस किया कि कुछ खो रहा है. उस ज़माने में मेरे बाल बहुत बड़े होते थे जो माँ को पसंद नहीं थे. उसकी शादी में जाना था लेकिन मन भीतर से रो रहा था. माँ ने घर पर नाई बुलवा कर बाल इतने छोटे करवा दिए जैसे आर्मी वालों के होते हैं. फिर मैं उस शादी में गया ही नहीं.'

इलाहाबाद के बारे में कमलेश्वर ने लिखा था, 'एक सोचता हुआ शहर था वो... कोई क्या खाता है, क्या पहनता है, कैसे रहता है, इस सबसे ऊपर इलाहाबाद के आदमी की पहचान ही यही थी कि वो क्या सोचता है...?'

कमलेश्वर ने बताया था, 'वो दौर इलाहाबाद का बहुत सुनहरा दौर था. बड़े से बड़े लेखक इलाहाबाद में मौजूद थे. मेरे अपने गुरु बच्चनजी विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे, फ़िराक साहब थे. सुमित्रानंदन पंत थे, महादेवीजी थीं, निरालाजी थे...किस किस को याद करें. हम लोग सब थे नई पीढ़ी के, धर्मवीर भारती थे, मार्कंडेय थे, दुष्यंत थे, अजित थे यानि कितने ही लोग.. यानि 'इट वाज़ अ गैलेक्सी ऑफ़ पीपुल.' इसकी वजह ये है कि इलाहाबाद में इस तरह का बौद्धिक माहौल हुआ करता था.. चाहे वो हाईकोर्ट के जज या वकील हों या विश्वविद्यालय में जो हमारे प्राध्यापक होते थे, उनके लिए नवरत्न तो बहुत छोटा जुमला हो जाएगा. वो एक तरह से सैकड़ों रत्नों की एक मंजूषा थी.'

कमलेश्वर ने आगे बताया था, 'जब हम लोग अकेले दो तीन दोस्त बैठते थे तो 'रामाज़' हुआ करता था. कॉफ़ी हाउस था और वहाँ की ख़ासियत ये थी कि जो भी ताज़ा किताब आई हो, या कोई ताज़ा विचार आया हो और अगर आप उससे परिचित नहीं थे तो आप उस महफ़िल में मंज़ूर नहीं किए जाते थे उस शाम. वहाँ से लौट कर हमारा बहुत बड़ा अड्डा था 'युनिवर्सल बुक डिपो'. वहाँ से हम किराए पर किताबें लेते थे, उन्हें पढ़ते थे और फिर तैयार हो कर जाते थे.'

कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव ने स्थापित किया था 'नई कहानी' का त्रिकोण. उस ज़माने में मोहन राकेश उनके सबसे करीबी दोस्त हुआ करते थे.

कमलेश्वर लिखते हैं कि जब राकेश अपनी पहली शादी के लिए इलाहाबाद पहुंचे थे, तो उनके साथ कोई बारात नहीं थी. लड़की वालों को आश्चर्य भी हुआ था कि दूल्हा अकेले आया है, पर यही तो थे मोहन राकेश.

कमलेश्वर ने एक किस्सा सुनाया था, 'नौ सालों तक मैं और राकेश एक ही घर में ऊपर नीचे रहे. वो ज़माना वो था कि जो लोग विभाजन के बाद यहाँ आए थे, उनको लोग अपना घर किराए पर नहीं देते थे. तब मैंने राकेश की माँ को अपनी माँ बनाया और मेरे नाम पर मकान लिया गया और राकेश मेरे साथ रहने लगे. क्योंकि हम लोग दिन भर मस्ती में बातें करने, गप्पें लड़ाने और नई कहानी की बातें सोचने में लगे रहे थे, जब भी कोई आता था तो हमें काफ़ी हाउस या टी हाउस में पाता था. एक दिन किसी ने पूछ लिया राकेश भाई आपकी दिनचर्या क्या होती है? राकेश ने कहा हम यही कोई साढ़े ग्यारह- बारह बजे घर पहुंचते हैं, एक दो घंटे पढ़ कर सो जाते हैं. उन्होंने कहा फिर? फिर हम उठते हैं ग्यारह बजे दिन में. फिर? फिर सुबह की चाय पीते पीते बारह-एक बज जाते हैं. उन्होंने कहा फिर? फिर ज़रा सा नाश्ता किया, शेव किया, नहाए-धोए. इसी में चार साढ़े चार बज जाते हैं. फिर? फिर हम कॉफ़ी हाउस आ जाते हैं. वो कहने लगे तब आप लिखते कब हैं ? राकेश ने कहा लिखना? लिखते हम कल हैं.'

कमलेश्वर के एक और करीबी दोस्त थे दुष्यंत कुमार. बाद में उनके पुत्र आलोक से उनकी बेटी मानो की शादी हुई.

आलोक त्यागी याद करते हैं, 'जब पापा का निधन हुआ, उससे तीन दिन पहले ये लोग मिले थे उज्जैन के एक सम्मेलन में. पापा ने उनसे बहुत कहा तू चल मेरे यहाँ, मैंने कुछ ग़ज़लें लिखी हैं. कमलेश्वर ने कहा कि यहीं सुनते हैं. मेरे प्रोग्राम 'टाइड अप' हैं बंबई में. तब पापा ने कहा था यार अब नहीं चलेगा तो क्या मेरी मौत पर आएगा ? ये 1975 की बात है. तीन दिन बाद ही पापा का निधन हो गया. उनके निधन के बाद हमारे यहाँ सबसे पहले पहुंचने वाले शख़्स थे कमलेश्वर. मैं उनके बारे में सालों से पापा से सुनता आ रहा था. होता ये था कि मैं कोई ढंग का काम करूँ और कोई अच्छी बात करूँ तो वो मेरी माँ से कहते थे राजो, ये मुझे कमलेश्वर की याद दिलाता है. मेरे लिए कमलेश्वर की छवि हमेशा 'लार्जर दैन लाइफ़' रही है. मैं उनको एकदम रूबरू देख रहा था. घर में इतना बड़ा संकट... घर में दुख के बादल और यदि हमें आश्वस्त करने के लिए और हमारे दुख में साथ खड़े होने के लिए कोई व्यक्ति सामने है, तो वो कमलेश्वरजी हैं.'

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