बीजिंग. चीन के कस्टम विभाग ने उन 30 हजार मानचित्रों को नष्ट कर दिया, जिनमें अरुणाचल प्रदेश और ताइवान को उनके कब्जे में नहीं दिखाया गया था। इन वैश्विक मानचित्रों की छपाई चीन में ही हुई थी। चीनी के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि सारे नक्शे किसी अज्ञात देश में भेजे जाने थे।
अरुणाचल को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा मानता है चीन
भारत के पूर्वोत्तर में स्थित अरुणाचल प्रदेश को चीन अपने कब्जे में बताता रहा है। उसका कहना है कि यह राज्य दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा है। यहां तक कि उसे भारतीय राजनेताओं के इस प्रदेश में आने पर भी आपत्ति है। चीन ने दलाई लामा के अरुणाचल दौरे का विरोध किया था। दलाई के वहां जाने पर नौ जगहों के नाम बदल दिए थे।
अरुणाचल से सटी 3488 किमी लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को लेकर भारत-चीन के बीच लंबे अर्से से विवाद चल रहा है। दोनों देश इस मसले पर 21 दौर की वार्ता कर चुके हैं, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकला।
ताइवान को भी चीन अलग देश के तौर पर मान्यता नहीं देता। चीन, ताइवान को अपना हिस्सा मानता है। हालांकि, वैश्विक मंचों पर अपनी स्वायत्ता को लेकर ताइवान लगातार आवाज उठा रहा है।
चाइना फॉरेन अफेयर्स यूनिवर्सिटी में इंटरनेशल लॉ के प्रोफेसर ली वेनजांग का कहना है कि नक्शे नष्ट करना सही कदम है। अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक ताइवान और दक्षिणी तिब्बत चीन के ही अभिन्न अंग हैं।
बिहार के हाईप्रोफाइल सीटों में से एक पटना साहिब में शत्रुघ्न सिन्हा के टिकट काटे जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को टिकट दिया तो इसी क्षेत्र से टिकट के प्रवल दावेदार आरके सिन्हा नाराज हो गए. इस बीच पार्टी के इन 2 बड़े नेताओं के समर्थकों के बीच भिड़ंत हो गई.
भारतीय जनता पार्टी की ओर से पटना साहिब लोकसभा सीट से उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद आज मंगलवार तो जब पहली बार केंद्रीय कानून मंत्री और बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद पटना पहुंचे तो उनका स्वागत करने के लिए हजारों की संख्या में उनके समर्थक फूल-माला के साथ पटना एयरपोर्ट पर मौजूद थे, लेकिन उस वक्त वहां पर अफरा-तफरी का माहौल हो गया जब बीजेपी राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा के समर्थक रविशंकर प्रसाद के समर्थकों के साथ भीड़ गए.
गौरतलब है, इस बात की आशंका पहले से ही थी कि पार्टी की ओर से पटना साहिब लोकसभा सीट से इस बार मौजूदा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा को टिकट नहीं मिलेगा और ऐसे में रविशंकर प्रसाद के साथ-साथ आरके सिन्हा को भी इस सीट से टिकट लेने का दावेदार माना जा रहा था.
ऐसे में रविशंकर प्रसाद को टिकट दिए जाने के बाद बताया जा रहा है कि आरके सिन्हा के समर्थक काफी नाराज चल रहे हैं. आज जब रविशंकर प्रसाद पटना एयरपोर्ट पर पहुंचे तो वहां पर ये सभी पहुंच गए और रविशंकर प्रसाद के समर्थकों के साथ उलझ गए और जमकर मारपीट हुई.
Tuesday, March 26, 2019
Wednesday, March 20, 2019
लोकसभा चुनाव 2019: देश मनमोहन के हाथों में सुरक्षित था या मोदी के
भारत में 11 अप्रैल से आम चुनाव शुरू हो रहे हैं. ऐसे में प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच इस बात पर खींचतान शुरू हो चुकी है कि किसके शासन में देश सुरक्षित रहेगा?
पिछली सरकार का नेतृत्व करने वाली विपक्षी कांग्रेस पार्टी का कहना है कि मौजूदा बीजेपी सरकार में चरमपंथी हमलों में 260% की बढ़ोत्तरी हुई है जबकि सीमा पार से घुसपैठ के मामले दोगुने हो चुके हैं.
कांग्रेस का ये भी कहना है कि मौजूदा शासन की तुलना में उनकी सरकार के समय में चार गुना ज़्यादा आतंकवादी मारे गए थे. चुनावी अभियान के समय बीबीसी रियलिटी चेक विभिन्न राजनीतिक दलों के दावे और वादों की पड़ताल कर रही है.
कांग्रेस पार्टी जो आंकड़े दे रही है उससे ज़ाहिर होता है कि यह केवल भारत प्रशासित कश्मीर क्षेत्र में सच हो सकता है, पूरे देश में नहीं. ऐसे में, सबसे पहले हम भारत प्रशासित कश्मीर के बारे में उपलब्ध जानकारी को ही देखते हैं.
1980 के दशक से ही कश्मीर में भारतीय सेना के जवानों को कश्मीर में सशस्त्र चरमपंथियों का सामना करना पड़ रहा है.
भारत और पाकिस्तान दोनों मुस्लिम बहुल कश्मीर पर अपना दावा जताते हैं लेकिन दोनों देश इसके एक-एक हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं.
दोनों देशों के बीच फरवरी महीने में तनाव तब बढ़ गया था जब भारत ने कथित रूप से पाकिस्तान की सीमा में स्थित चरमपंथी कैंपों पर एयर स्ट्राइक की और पाकिस्तान ने इसका जवाब देने की कोशिश की.
भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि भारत प्रशासित कश्मीर में 2013 तक चरमपंथी हिंसा के मामले लगातार कम हो रहे थे, लेकिन बीते कुछ सालों में इसमें बढ़ोत्तरी देखने को मिली है.
भारतीय गृह मंत्रालय के मुताबिक, भारत प्रशासित कश्मीर में 2013 में 170 चरमपंथ से जुड़ी घटनाएं हुई थीं जो 2018 में बढ़कर 614 हो गईं- यह 260% की बढ़ोत्तरी है.
यानी कांग्रेस पार्टी जो कह रही है, हक़ीक़त उससे मेल खाती है.
हालांकि, अगर आप मौजूदा बीजेपी सरकार और पिछली कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को थोड़े विस्तृत संदर्भ में देखें तो चरमपंथी गतिविधियों में एक तरह से समानता देखने को मिलती है.
2009- 2013 के बीच ऐसी 1717 घटनाएं हुईं थीं जबकि 2014 से 2018 के बीच 1708 घटनाएं हुई हैं, जो कि पिछली सरकार के समय से कम हैं.
जहां तक कांग्रेस का दावा है कि मौजूदा बीजेपी सरकार की तुलना में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान बड़ी संख्या में चरमपंथी मारे गए थे, तो आंकड़े इसकी भी तस्दीक करते हैं.
दक्षिण एशियाई चरमपंथी पोर्टल (एसएटीपी) एक स्वतंत्र और गैर सरकारी समूह है, जो सरकारी स्रोतों और मीडिया रिपोर्ट्स से आंकड़े एकत्रित करता है.
ऐसा मालूम होता है कि कांग्रेस ने इसी स्रोत से ये आंकड़े लिए हैं जो बताते हैं कि कांग्रेस के शासन काल में बीजेपी के शासन काल की तुलना में चार गुना चरमपंथी मारे गए थे.
गृह मंत्रालय की ओर से प्रकाशित सरकार के आधिकारिक आकंड़ों भी ऐसा ही पैटर्न बताते हैं लेकिन वहां संख्या कम ज़रूर है.
हालांकि, यह देखना महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के दो कार्यकालों की तुलना बीजेपी के एक कार्यकाल वाली सरकार से की जा रही है.
ऐसे में कांग्रेस का दावा पूरी तरह से ग़लत साबित होता है.
अगर आप मौजूदा बीजेपी सरकार के आंकड़ों की तुलना कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के दूसरे कार्यकाल (2009 से 2014) तक करें तो आपको मालूम होगा कि बीजेपी सरकार के दौरान ज़्यादा चरमपंथी मारे गए हैं.
घुसपैठ की कोशिश
भारत अपने यहां होने वाली घुसपैठ की कोशिशों की भी निगरानी करता है. जब किसी चरमपंथी समूह का कोई व्यक्ति भारत प्रशासित कश्मीर में घुसने की कोशिश करता है तो उसे घुसपैठ की घटना कहते हैं.
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2011 से 2014 के बीच हर साल नियंत्रण रेखा को पार करने की करीब 250 कोशिशें हुई. 2016 के बाद से इनकी संख्या बढ़ी है. हालांकि, कई कोशिशों को नाकाम भी किया गया है.
भारत के दूसरे हिस्सों का हाल?
उत्तर-पूर्वी राज्यों में दशकों से नस्लीय और अलगाववादी संघर्ष चल रहा है, जिसमें कुछ लोगों का समूह स्वायत्तता चाहता है तो कुछ लोग पूरी तरह से आज़ादी चाहते हैं.
2012 को अपवाद मान लें तो इलाके में हिंसक घटनाओं में कमी ही आई है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़ 2015 के बाद से आम नागरिक और सशस्त्र जवानों की मौत में भी कमी आई है.
गृह मंत्रालय के मुताबिक 1997 से लेकर अब तक में सबसे कम हिंसक घटनाएं, 2017 में हुई हैं.
जहां तक माओवादी विद्रोहियों की बात है, तो वो कई पूर्वी और मध्य राज्यों में सक्रिय हैं. वे साम्यवादी शासन और आदिवासी-ग़रीब लोगों के लिए ज़्यादा अधिकार के नाम पर संघर्ष कर रहे हैं.
लेकिन, बीजेपी का कहना है कि हाल के सालों में वामपंथी चरमपंथी हिंसा कम हुई है. बीजेपी के मुताबिक 2014 से 2017 के बीच 3,380 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है. इस आंकड़े का ज़िक्र नरेंद्र मोदी ने बीते साल अपने एक इंटरव्यू में किया था.
दक्षिण एशियाई चरमपंथी पोर्टल में सरकारी और स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर आंकड़ा 4,000 से ज़्यादा पहुंचता है.
संसद में आधिकारिक बयान में कहा गया है कि 2014 से मध्य नवंबर, 2018 तक 3,386 कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है.
वामपंथी हिंसक घटनाओं में 2014 के बाद से लगातार कमी देखने को मिली है. लेकिन गृह मंत्रालय का ख़ुद ही कहना है कि ये ट्रेंड 2011 से शुरू हुआ था जब कांग्रेस पार्टी सत्त्ता में थी.
ज़ाहिर है कि भारत प्रशासित कश्मीर में आतंकी घटनाएं बीते कुछ सालों में बढ़ी हैं लेकिन ऊत्तरी पूर्व में अलगाववादी और देश के दूसरे हिस्सों में वामपंथी हिंसा में कमी हुई है.
पिछली सरकार का नेतृत्व करने वाली विपक्षी कांग्रेस पार्टी का कहना है कि मौजूदा बीजेपी सरकार में चरमपंथी हमलों में 260% की बढ़ोत्तरी हुई है जबकि सीमा पार से घुसपैठ के मामले दोगुने हो चुके हैं.
कांग्रेस का ये भी कहना है कि मौजूदा शासन की तुलना में उनकी सरकार के समय में चार गुना ज़्यादा आतंकवादी मारे गए थे. चुनावी अभियान के समय बीबीसी रियलिटी चेक विभिन्न राजनीतिक दलों के दावे और वादों की पड़ताल कर रही है.
कांग्रेस पार्टी जो आंकड़े दे रही है उससे ज़ाहिर होता है कि यह केवल भारत प्रशासित कश्मीर क्षेत्र में सच हो सकता है, पूरे देश में नहीं. ऐसे में, सबसे पहले हम भारत प्रशासित कश्मीर के बारे में उपलब्ध जानकारी को ही देखते हैं.
1980 के दशक से ही कश्मीर में भारतीय सेना के जवानों को कश्मीर में सशस्त्र चरमपंथियों का सामना करना पड़ रहा है.
भारत और पाकिस्तान दोनों मुस्लिम बहुल कश्मीर पर अपना दावा जताते हैं लेकिन दोनों देश इसके एक-एक हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं.
दोनों देशों के बीच फरवरी महीने में तनाव तब बढ़ गया था जब भारत ने कथित रूप से पाकिस्तान की सीमा में स्थित चरमपंथी कैंपों पर एयर स्ट्राइक की और पाकिस्तान ने इसका जवाब देने की कोशिश की.
भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि भारत प्रशासित कश्मीर में 2013 तक चरमपंथी हिंसा के मामले लगातार कम हो रहे थे, लेकिन बीते कुछ सालों में इसमें बढ़ोत्तरी देखने को मिली है.
भारतीय गृह मंत्रालय के मुताबिक, भारत प्रशासित कश्मीर में 2013 में 170 चरमपंथ से जुड़ी घटनाएं हुई थीं जो 2018 में बढ़कर 614 हो गईं- यह 260% की बढ़ोत्तरी है.
यानी कांग्रेस पार्टी जो कह रही है, हक़ीक़त उससे मेल खाती है.
हालांकि, अगर आप मौजूदा बीजेपी सरकार और पिछली कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को थोड़े विस्तृत संदर्भ में देखें तो चरमपंथी गतिविधियों में एक तरह से समानता देखने को मिलती है.
2009- 2013 के बीच ऐसी 1717 घटनाएं हुईं थीं जबकि 2014 से 2018 के बीच 1708 घटनाएं हुई हैं, जो कि पिछली सरकार के समय से कम हैं.
जहां तक कांग्रेस का दावा है कि मौजूदा बीजेपी सरकार की तुलना में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान बड़ी संख्या में चरमपंथी मारे गए थे, तो आंकड़े इसकी भी तस्दीक करते हैं.
दक्षिण एशियाई चरमपंथी पोर्टल (एसएटीपी) एक स्वतंत्र और गैर सरकारी समूह है, जो सरकारी स्रोतों और मीडिया रिपोर्ट्स से आंकड़े एकत्रित करता है.
ऐसा मालूम होता है कि कांग्रेस ने इसी स्रोत से ये आंकड़े लिए हैं जो बताते हैं कि कांग्रेस के शासन काल में बीजेपी के शासन काल की तुलना में चार गुना चरमपंथी मारे गए थे.
गृह मंत्रालय की ओर से प्रकाशित सरकार के आधिकारिक आकंड़ों भी ऐसा ही पैटर्न बताते हैं लेकिन वहां संख्या कम ज़रूर है.
हालांकि, यह देखना महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के दो कार्यकालों की तुलना बीजेपी के एक कार्यकाल वाली सरकार से की जा रही है.
ऐसे में कांग्रेस का दावा पूरी तरह से ग़लत साबित होता है.
अगर आप मौजूदा बीजेपी सरकार के आंकड़ों की तुलना कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के दूसरे कार्यकाल (2009 से 2014) तक करें तो आपको मालूम होगा कि बीजेपी सरकार के दौरान ज़्यादा चरमपंथी मारे गए हैं.
घुसपैठ की कोशिश
भारत अपने यहां होने वाली घुसपैठ की कोशिशों की भी निगरानी करता है. जब किसी चरमपंथी समूह का कोई व्यक्ति भारत प्रशासित कश्मीर में घुसने की कोशिश करता है तो उसे घुसपैठ की घटना कहते हैं.
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2011 से 2014 के बीच हर साल नियंत्रण रेखा को पार करने की करीब 250 कोशिशें हुई. 2016 के बाद से इनकी संख्या बढ़ी है. हालांकि, कई कोशिशों को नाकाम भी किया गया है.
भारत के दूसरे हिस्सों का हाल?
उत्तर-पूर्वी राज्यों में दशकों से नस्लीय और अलगाववादी संघर्ष चल रहा है, जिसमें कुछ लोगों का समूह स्वायत्तता चाहता है तो कुछ लोग पूरी तरह से आज़ादी चाहते हैं.
2012 को अपवाद मान लें तो इलाके में हिंसक घटनाओं में कमी ही आई है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़ 2015 के बाद से आम नागरिक और सशस्त्र जवानों की मौत में भी कमी आई है.
गृह मंत्रालय के मुताबिक 1997 से लेकर अब तक में सबसे कम हिंसक घटनाएं, 2017 में हुई हैं.
जहां तक माओवादी विद्रोहियों की बात है, तो वो कई पूर्वी और मध्य राज्यों में सक्रिय हैं. वे साम्यवादी शासन और आदिवासी-ग़रीब लोगों के लिए ज़्यादा अधिकार के नाम पर संघर्ष कर रहे हैं.
लेकिन, बीजेपी का कहना है कि हाल के सालों में वामपंथी चरमपंथी हिंसा कम हुई है. बीजेपी के मुताबिक 2014 से 2017 के बीच 3,380 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है. इस आंकड़े का ज़िक्र नरेंद्र मोदी ने बीते साल अपने एक इंटरव्यू में किया था.
दक्षिण एशियाई चरमपंथी पोर्टल में सरकारी और स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर आंकड़ा 4,000 से ज़्यादा पहुंचता है.
संसद में आधिकारिक बयान में कहा गया है कि 2014 से मध्य नवंबर, 2018 तक 3,386 कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है.
वामपंथी हिंसक घटनाओं में 2014 के बाद से लगातार कमी देखने को मिली है. लेकिन गृह मंत्रालय का ख़ुद ही कहना है कि ये ट्रेंड 2011 से शुरू हुआ था जब कांग्रेस पार्टी सत्त्ता में थी.
ज़ाहिर है कि भारत प्रशासित कश्मीर में आतंकी घटनाएं बीते कुछ सालों में बढ़ी हैं लेकिन ऊत्तरी पूर्व में अलगाववादी और देश के दूसरे हिस्सों में वामपंथी हिंसा में कमी हुई है.
Friday, March 8, 2019
सपा की पहली लिस्ट जारी, मैनपुरी से चुनाव लड़ेंगे मुलायम, फिरोजाबाद से अक्षय यादव
लोकसभा चुनाव की तारीखों का अभी ऐलान होना बाकी है, लेकिन इससे पहले ही सभी राजनीतिक दल अपनी चुनावी तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं. कई राजनीतिक दलों ने अपने चुनाव पूर्व गठबंधन करने के बाद अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी करनी शुरू कर दी है. गुरुवार को कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी थी, और अब समाजवादी पार्टी ने भी अपनी पहली लिस्ट जारी कर दी है. 6 उम्मीदवारों की लिस्ट में मुलायम के परिवार से 3 लोगों के नाम शामिल हैं.
उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन करने वाली समाजवादी पार्टी ने शुक्रवार को अपने 6 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर दी है. इस लिस्ट के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से चुनाव लड़ेंगे. जबकि मुलायम के भतीजे धर्मेंद्र यादव बदायूं से अपनी किस्मत आजमाएंगे. समाजवादी पार्टी के प्रमुख महासचिव राम गोपाल यादव की ओर से जारी लिस्ट के अनुसार, फिरोजाबाद से अक्षय यादव के अलावा इटावा (सुरक्षित सीट) कमलेश कठेरिया, बहराइच (सुरक्षित सीट) शब्बीर वाल्मिकि और राबर्ट्सगंज (सुरक्षित सीट) से भाईलाल कोल को टिकट दिया गया है.
फिरोजाबाद से टिकट पाने वाले अक्षय यादव पार्टी के वरिष्ठ नेता राम गोपाल यादव के बेटे हैं. इस तरह से सपा की पहली लिस्ट में मुलायम परिवार की धूम रही. इस लिस्ट में सिर्फ एक मुस्लिम नेता को टिकट दिया गया है.
इससे पहले कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के लिए गुरुवार को अपने पहले 15 उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया. उम्मीदवारों की इस लिस्ट में उत्तर प्रदेश के 11 और गुजरात के 4 उम्मीदवारों के नाम शामिल हैं. लिस्ट के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने वर्तमान संसदीय क्षेत्र अमेठी से ही चुनाव लड़ेंगे, जबकि यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी अपनी परंपरागत सीट रायबरेली से ही चुनाव लड़ेंगी.
इस बार लोकसभा चुनाव अखिलेश यादव की अगुवाई में लड़ रही है सपा
कांग्रेस की लोकसभा चुनाव को लेकर जारी पहली लिस्ट के मुताबिक पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद यूपी की फर्रुखाबाद सीट से चुनावी ताल ठोकेंगे. इसके अलावा सहारनपुर से इमरान मसूद, उन्नाव से अनु टंडन, जालौन से बृजलाल खबरी, बदायूं से सलीम इकबाल शेरवानी, अकबरपुर से राजाराम पाल, फैजाबाद से निर्मल खत्री के अलावा कुशीनगर से पूर्व केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह को टिकट दिया गया है.
प्रो. अरुण कुमार का मानना है कि नोटबंदी का नतीजा यह हुआ कि बाजार से सारा कैश बैंक में वापस आ गया. नोटबंदी से कैश की कमी तो आई लेकिन इससे सरकार यह पता नहीं लगा पाई कि देश के अंदर कितना काला धन मौजूद है. माना जाता है कि काले धन का मात्र 1 फीसदी कैश में है. इसके बाद सरकार ने कहा कि जिन लोगों ने क्षमता से ज्यादा कैश जमा कराया है, उन्हें नोटिस भेजा जा रहा है. इसी क्रम में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने 18 लाख लोगों को नोटिस भी भेजे. लेकिन अभी हाल ही में खबर आई कि सरकार इसमें से मात्र 90 हजार लोगों की तहकीकात करेगी.
केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने से पहले विदेशी बैंकों में काले धन को लेकर तमाम तरह के आंकड़ों का दावा किया गया. प्रो. अरुण कुमार कहते हैं कि विदेश में काला धन 6 लेयर में जाता है और दुनिया में कुल 90 टैक्स हेवन हैं. इस बीच पनामा पेपर्स, पैराडाइज पेपर्स, ब्रिटिश वर्जीनिया पेपर्स, एचएसबीसी लीक जैसे मामले सामने आए. स्विस बैंक ने भी जो खुलासा किया वो बहुत कम था. इन खुलासों में कुछ हजार लोगों के नाम सामने आए. जबकि इनकी संख्या लाखों में है. जिनका सरकार पता नहीं लगा पाई. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि काला धन एक टैक्स हेवन से दूसरे टैक्स हेवन में घूमता रहा और कुछ देश में निवेश के जरिए वापस भी आ गया.
प्रोफेसर अरुण कुमार बताते हैं कि बड़े-बड़े घोटालों का पता 4-5 साल बाद चलता है. जैसे यूपीए-1 में हुए 2जी, कोयला घोटाला का पता यूपीए-2 के समय चला. इसलिए मौजूदा सरकार में घोटाले हुए या नहीं इसका पता भी हमें 4-5 साल बाद ही चलेगा. अभी यह नहीं कहा जा सकता कि इस सरकार में घोटाला नहीं हुआ. डी-मैट और व्यापम जैसे बड़े मामले हमारे सामने हैं. लिहाजा अरुण कुमार का मानना है SIT गठन से लेकर आज तक काले धन पर अंकुश लगाने पर कुछ विशेष कामयाबी मिलती नहीं दिखी. लोग नए नियमों की जटिलता का फायदा उठाते हुए अपना रास्ता निकालते रहे.
उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन करने वाली समाजवादी पार्टी ने शुक्रवार को अपने 6 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर दी है. इस लिस्ट के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से चुनाव लड़ेंगे. जबकि मुलायम के भतीजे धर्मेंद्र यादव बदायूं से अपनी किस्मत आजमाएंगे. समाजवादी पार्टी के प्रमुख महासचिव राम गोपाल यादव की ओर से जारी लिस्ट के अनुसार, फिरोजाबाद से अक्षय यादव के अलावा इटावा (सुरक्षित सीट) कमलेश कठेरिया, बहराइच (सुरक्षित सीट) शब्बीर वाल्मिकि और राबर्ट्सगंज (सुरक्षित सीट) से भाईलाल कोल को टिकट दिया गया है.
फिरोजाबाद से टिकट पाने वाले अक्षय यादव पार्टी के वरिष्ठ नेता राम गोपाल यादव के बेटे हैं. इस तरह से सपा की पहली लिस्ट में मुलायम परिवार की धूम रही. इस लिस्ट में सिर्फ एक मुस्लिम नेता को टिकट दिया गया है.
इससे पहले कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के लिए गुरुवार को अपने पहले 15 उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया. उम्मीदवारों की इस लिस्ट में उत्तर प्रदेश के 11 और गुजरात के 4 उम्मीदवारों के नाम शामिल हैं. लिस्ट के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने वर्तमान संसदीय क्षेत्र अमेठी से ही चुनाव लड़ेंगे, जबकि यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी अपनी परंपरागत सीट रायबरेली से ही चुनाव लड़ेंगी.
इस बार लोकसभा चुनाव अखिलेश यादव की अगुवाई में लड़ रही है सपा
कांग्रेस की लोकसभा चुनाव को लेकर जारी पहली लिस्ट के मुताबिक पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद यूपी की फर्रुखाबाद सीट से चुनावी ताल ठोकेंगे. इसके अलावा सहारनपुर से इमरान मसूद, उन्नाव से अनु टंडन, जालौन से बृजलाल खबरी, बदायूं से सलीम इकबाल शेरवानी, अकबरपुर से राजाराम पाल, फैजाबाद से निर्मल खत्री के अलावा कुशीनगर से पूर्व केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह को टिकट दिया गया है.
प्रो. अरुण कुमार का मानना है कि नोटबंदी का नतीजा यह हुआ कि बाजार से सारा कैश बैंक में वापस आ गया. नोटबंदी से कैश की कमी तो आई लेकिन इससे सरकार यह पता नहीं लगा पाई कि देश के अंदर कितना काला धन मौजूद है. माना जाता है कि काले धन का मात्र 1 फीसदी कैश में है. इसके बाद सरकार ने कहा कि जिन लोगों ने क्षमता से ज्यादा कैश जमा कराया है, उन्हें नोटिस भेजा जा रहा है. इसी क्रम में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने 18 लाख लोगों को नोटिस भी भेजे. लेकिन अभी हाल ही में खबर आई कि सरकार इसमें से मात्र 90 हजार लोगों की तहकीकात करेगी.
केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने से पहले विदेशी बैंकों में काले धन को लेकर तमाम तरह के आंकड़ों का दावा किया गया. प्रो. अरुण कुमार कहते हैं कि विदेश में काला धन 6 लेयर में जाता है और दुनिया में कुल 90 टैक्स हेवन हैं. इस बीच पनामा पेपर्स, पैराडाइज पेपर्स, ब्रिटिश वर्जीनिया पेपर्स, एचएसबीसी लीक जैसे मामले सामने आए. स्विस बैंक ने भी जो खुलासा किया वो बहुत कम था. इन खुलासों में कुछ हजार लोगों के नाम सामने आए. जबकि इनकी संख्या लाखों में है. जिनका सरकार पता नहीं लगा पाई. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि काला धन एक टैक्स हेवन से दूसरे टैक्स हेवन में घूमता रहा और कुछ देश में निवेश के जरिए वापस भी आ गया.
प्रोफेसर अरुण कुमार बताते हैं कि बड़े-बड़े घोटालों का पता 4-5 साल बाद चलता है. जैसे यूपीए-1 में हुए 2जी, कोयला घोटाला का पता यूपीए-2 के समय चला. इसलिए मौजूदा सरकार में घोटाले हुए या नहीं इसका पता भी हमें 4-5 साल बाद ही चलेगा. अभी यह नहीं कहा जा सकता कि इस सरकार में घोटाला नहीं हुआ. डी-मैट और व्यापम जैसे बड़े मामले हमारे सामने हैं. लिहाजा अरुण कुमार का मानना है SIT गठन से लेकर आज तक काले धन पर अंकुश लगाने पर कुछ विशेष कामयाबी मिलती नहीं दिखी. लोग नए नियमों की जटिलता का फायदा उठाते हुए अपना रास्ता निकालते रहे.
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