Tuesday, July 30, 2019

कारगिलः जब भारत की सिफ़ारिश पर पाक सैनिक को मिला सर्वोच्च वीरता पुरस्कार

ऐसा बहुत कम देखने में आता है कि शत्रु सेना किसी सैनिक की बहादुरी की दाद दे और उसकी सेना को लिख कर कहे कि इस सैनिक की वीरता का सम्मान किया जाना चाहिए.

1999 के कारगिल युद्ध में ऐसा ही हुआ जब टाइगर हिल के मोर्चे पर पाकिस्तानी सेना के कैप्टन कर्नल शेर ख़ाँ ने इतनी बहादुरी से लड़ाई लड़ी कि भारतीय सेना ने उनका लोहा माना.

उस लड़ाई को कमांड कर रहे ब्रिगेडियर एमएस बाजवा याद करते हैं, "जब ये लड़ाई ख़त्म हुई तो मैं क़ायल था इस अफ़सर का. मैं 71 की लड़ाई भी लड़ चुका हूँ. मैंने कभी पाकिस्तानी अफ़सर को लीड करते नहीं देखा. बाकी सारे पाकिस्तानी कुर्ते पाजामे में थे. अकेला ये ट्रैक सूट पहने हुए था."

हाल ही में कारगिल पर एक किताब 'कारगिल अनटोल्ड स्टोरीज़ फ़्राम द वॉर' लिखने वाली रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "कैप्टन कर्नल शेर ख़ाँ नॉर्दर्न लाइट इंफ़ैंट्री के थे."

"टाइगर हिल पर पांच जगहों पर उन्होंने अपनी चौकियां बना रखी थीं. पहले 8 सिख को उन पर कब्ज़ा करने का काम दिया गया था. लेकिन वो उन पर कब्ज़ा नहीं कर पाए. बाद में जब 18 ग्रेनेडियर्स को भी उनके साथ लगाया गया तो वो एक चौकी पर किसी तरह कब्ज़ा करने में कामयाब हो गए. लेकिन कैप्टन शेर ख़ाँ ने एक जवाबी हमला किया."

एक बार नाकाम होने पर उन्होंने फिर अपने सैनिकों को 'रिग्रुप' कर दोबारा हमला किया. जो लोग ये 'बैटल' देख रहे थे, वो सब कह रहे थे कि ये 'आत्मघाती' था. वो जानते थे कि ये मिशन कामयाब नहीं हो पाएगा, क्योंकि भारतीय सैनिकों की संख्या उनसे कहीं ज़्यादा थी.

ब्रिगेडियर एमपीएस बाजवा कहते हैं, "कैप्टन शेर खाँ लंबा-चौड़ा शख़्स था. वो बहुत बहादुरी से लड़ा. आख़िर में हमारा एक जवान कृपाल सिंह जो ज़ख्मी पड़ा हुआ था, उसने अचानक उठ कर 10 गज़ की दूरी से एक 'बर्स्ट' मारा और शेर ख़ाँ को गिराने में कामयाब रहा."

शेर ख़ाँ का गिरना था कि उनके हमले की धार जाती रही. ब्रिगेडियर बाजवा बताते हैं, "हमने वहां 30 पाकिस्तानियों के शवों को दफ़नाया. लेकिन मैंने सिविलियन पोर्टर्स भेजकर कैप्टेन कर्नल शेर ख़ाँ के शव को नीचे मंगवाया, पहले हमने उसे ब्रिगेड हेडक्वार्टर में रखा."

जब उनकी बॉडी वापस गई तो उनकी जेब में ब्रिगेडियर बाजवा ने एक चिट रखी जिस पर लिखा था, 'कैप्टन कर्नल शेर ख़ाँ ऑफ़ 12 एनएलआई हैज़ फ़ॉट वेरी ब्रेवली एंड ही शुड बी गिवेन हिज़ ड्यू.''

कैप्टन कर्नल शेर खाँ का जन्म उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत के एक गांव नवा किल्ले में हुआ था. उनके दादा ने 1948 के कश्मीर अभियान में भाग लिया था.

उन्हें वर्दी पहने हुए सैनिक पसंद थे. उनका जब एक पोता पैदा हुआ तो उन्होंने उसका नाम कर्नल शेर ख़ाँ रखा.

उस समय उनको इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि इस नाम की वजह से उनके पोते की ज़िदगी में कई उलझनें आएंगी.

कारगिल पर मशहूर किताब 'विटनेस टू ब्लंडर - कारगिल स्टोरी अनफ़ोल्ड्स' लिखने वाले कर्नल अशफ़ाक हुसैन बताते हैं, "कर्नल, शेर खाँ के नाम का हिस्सा था और वो उसे बहुत गर्व से इस्तेमाल करते थे. कई बार इससे काफ़ी मुश्किलें पैदा हो जाती थीं."

"जब वो फ़ोन उठा कर कहते थे 'लेफ़्टिनेंट कर्नल शेर स्पीकिंग' तो फ़ोन करने वाला समझता था कि वो कमांडिंग ऑफ़िसर से बात कर रहा है और वो उन्हें 'सर' कहना शुरू कर देता था. तब शेर मुस्कराते कर कहते थे कि वो लेफ़्टिनेंट शेर हैं. मैं अभी आपकी बात कमांडिंग ऑफ़िसर से करवाता हूँ."

र्नल शेर ने अक्तूबर, 1992 में पाकिस्तानी मिलिट्री अकादमी ज्वाइन की थी. जब वो वहां पहुंचे तो उन्होंने दाढ़ी रखी हुई थी. उनसे कहा गया कि वो दाढ़ी कटवा दें लेकिन उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया.

उनके आख़िरी सत्र में उनसे फिर कहा गया कि आपका प्रदर्शन अच्छा रहा है. आप अगर दाढ़ी कटवा दें तो आपको अच्छी जगह पोस्टिंग मिल सकती है.

लेकिन उन्होंने फिर इनकार कर दिया. लेकिन तब भी उन्हें बटालियन क्वार्टर मास्टर का पद दे दिया गया.

उनसे एक साल जूनियर रहे कैप्टन अलीउल हसनैन बताते हैं, "पाकिस्तान मिलिट्री अकादमी में सीनियर, रैगिंग के दौरान अक्सर जूनियर्स के लिए गालियों का इस्तेमाल करते थे. लेकिन मैंने शेर ख़ाँ के मुंह से कभी कोई गाली नहीं सुनी. उनकी अंग्रेज़ी बहुत अच्छी थी और वो दूसरे अफ़सरों के साथ 'स्क्रैबल' खेला करते थे और अक्सर जीतते भी थे. जवानों के साथ भी वो बहुत आसानी से घुलमिल जाते थे और उनके साथ लूडो खेलते थे."

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